শনিবার, ২০ এপ্রিল ২০১৯
Friday, 12 Apr, 2019 03:52:30 pm
No icon No icon No icon

तनवीर हसन की उम्मीदवारी से मुकाबला होगा त्रिकोणीय या BJP की राह होगी आसान


तनवीर हसन की उम्मीदवारी से मुकाबला होगा त्रिकोणीय या BJP की राह होगी आसान


टाइम्स 24 डॉटनेट, इंडिया: बिहार में लोकसभा चुनाव की धमक शुरु होते ही कुछ सीटेंं चर्चा में आ गईं. इनमें एक सीट बेगूसराय की है. दरअसल बीजेपी ने गठबंधन का धर्म निभाते हुए नवादा से सांसद और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को बेगूसराय शिफ्ट कर दिया. इसके बाद नवादा सीट एलजेपी को दे दी. नवादा से हटने और बेगूसराय से चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने को लेकर गिरिराज सिंह का हाईप्रोफाइल ड्रामा काफी चर्चा में रहा. बेगूसराय की सीट पर चर्चा का दूसरा कारण रहा जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी. जिस पर लंबे समय तक यही अटकलें लगती रहीं कि कन्हैया को महागठबंधन अपना उम्मीदवार बनाएगाा या नहीं. आखिर में महागठबंधन ने कन्हैया कुमार को न सिर्फ अपना उम्मीदवार बनाने से मना किया, बल्कि सीपीआई को भी महागठबंधन से बाहर कर दिया. हालांकि, सीपीआई ने कन्हैया को उम्मीदवार बनाकर गिरिराज सिंह के सामने खडा कर दिया. इसके बाद आरजेडी ने बेगूसराय सीट से तनवीर हसन को अपना उम्मीदवार बनाकर लडाई को त्रिकोणीय बना दिया.

तनवीर हसन आरजेडी के पुराने और वरिष्ठ नेता हैं. आरजेडी ने तनवीर हसन को चार बार विधान परिषद सदस्य बनाया. वह 2014 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी उम्मीदवार रहे. उस चुनाव में उनकी लडाई बीजेपी के भोला सिंह के साथ थी. तनवीर हसन भोला सिंह से 60 हजार वोट से हार गए. भोला सिंह को 4 लाख 28 हजार 227 वोट मिले थे. वहीं, तनवीर को 3 लाख 69 हजार 892 वोट मिले थे.
तनवीर हसन को बेगूसराय सीट से फिर उम्मीदवार बनाने के पीछे आरजेडी का तर्क रहा कि पिछले चुनाव का परिणाम जो भी रहा हो, लेकिन उन्हेंं अच्छा खासा जन समर्थन मिला था. बेगूसराय भूमिहार बहुल क्षेत्र माना जाता है लेकिन मुस्लिम वोटों की संख्या भी तकरीबन 2 लाख 84 हजार है. साथ ही यादव वोट भी तकरीबन डेढ लाख के आसपास हैंं. तनवीर हसन को फिर उम्मीदवार बनाने के पीछे भी लालू प्रसाद यादव का पुराना समीकरण माना जा रहा है.
आरजेडी ने जब तनवीर हसन को उम्मीदवार बनाया तब सवाल उठे कि आखिर क्यों तेजस्वी ने कन्हैया को नजरअंदाज कर तनवीर हसन पर भरोसा जताया. महागठबंधन में उम्मीदवार की घोषणा होने से पहले ही सीपीआई ने कन्हैया को बेगूसराय से उम्मीदवार घोषित कर अपने सहयोगी दलों पर दबाव बनाया कि वे कन्हैया का समर्थन करेंं. यह दबाव तेजस्वी के लिए भी था. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, तेजस्वी को यह कतई मंजूर नहीं था कि उनके सामने किसी और नेता की चर्चा हो और उसे हाइप मिले. कन्हैया कुमार बेवाक वक्ता के रुप में भी जाने जाते हैंं. ऐसे में अगर वह महागठबंधन में आते तो लोग तेजस्वी के साथ कन्हैया की तुलना करने लगेंगे. तनवीर हसन की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद सीपीआई नेताओं ने यह आरोप भी लगाया था कि तेजस्वी का मकसद गिरिराज को हराना नहीं, बल्कि कन्हैया को हराना है.
गिरिराज सिंह और कन्हैया दोनों भूमिहार जाति से आते हैं. बेगूसराय में तकरीबन पौने चार लाख भूमिहार वोट हैंं. ऐसे में अगर यह वोट बैंक बंट गया तो बीजेपी के सवर्ण वोट बैंंक के समर्थन से गिरिराज सिंह को कम, जबकि कन्हैया को ज्यादा नुकसान हो सकता है. साथ ही जेडीयू के साथ होने से पिछडा, अतिपिछडा वोट का लाभ भी गिरिराज को मिलेगा. वहीं, तनवीर हसन को मुस्लिम और यादव वोट मिलेगा. साथ ही पिछडा, अति पिछडा, दलित वोट का लाभ भी मिलेगा.

फिलहाल लड़ाई त्रिकोणीय है. अगर इस लड़ाई में कन्हैया को कांग्रेस और आरजेडी का साथ मिल जाता तो लड़ाई गिरिराज सिंह के लिए मुश्किल हो सकती थी. लेकिन, तेजस्वी ने किसी बॉरो प्लेयर की जगह अपने रेगुलर प्लेयर के भरोसे चुनावी चौसर खेलना ज्यादा बेहतर समझा.

सोर्स: न्यूज़ 18.कॉम

এই রকম আরও খবর




Editor: Habibur Rahman
Dhaka Office : 149/A Dit Extension Road, Dhaka-1000
Email: [email protected], Cell : 01733135505
[email protected] by BDTASK